उत्तराखंड में भोटिया प्रजाति का इतिहास


उत्तराखंड की दुर्गम पहाड़ी पर निवास करने वाली आदि प्रजातियों में एक महत्वपूर्ण प्रजाति भोटिया प्रजाति या शोका प्रजाति भी हैं। भोटिया प्रजाति की शारीरिक बनावट के आधार पर इन्हें कीरात प्रजाति से संबंधित माना जाता है। भोटिया प्रजाति मंगोल प्रजाति के सामान दाढ़ी मूछ, एवं छोटी नाक हष्ट पुष्ट शरीर होते हैं।




भोटिया प्रजाति सामान्य रूप से उत्तराखंड में पाई जाती है परंतु चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा बागेश्वर जिले को विशेष तौर पर इन का गढ़ माना जाता है। भोटिया प्रजाति भूमि भारत तिब्बत सीमा भारतीय क्षेत्रों को बनाया गया है ऐसा संभवत तिब्बत से व्यापार करने के उद्देश्य से किया गया होगा। प्राचीन काल से हीभो प्रजाति शब्द को एक व्यापारिक प्रजाति के रूप में माना जाता है। भोटिया शब्द की उत्पत्ति भोट शब्द से जानी जाती है जिसका अर्थ तिब्बत तथा भूटिया होता है। यद्यपि स्वयं को भुटिया कहलाने के लिए तुलछा, मारछा कहलाना उचित समझते हैं। पूरा ग्रंथों एवं अभिलेखों में इन्हें शोका शब्द से ही संबोधित किया जाता है। भोटिया प्रजाति शब्द की उत्पत्ति ब्रिटिश कालीन लेखकों की देन है।

भोटिया प्रजाति मान्यता 6 वर्गों में विभाजित किया गया है शोका, जुहारी, दरमियां, तोलछा,मरछा, और जाड। दरमियां पिथौरागढ़ जिले में  दारमा परगने के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र दारमा व्यास धौलीगंगा कुमाऊं तथा काली नदियों की घाटियों में निवास करने वाले शोका, गोरी नदी की घाटी के निवासी जो मुख्य त्योहार मुनस्यारी परगना के अंतर्गत आते हैं जुहारी कहलाते हैं, विष्णु गंगा नदी की घाटियां में बात करने वाली आदिम प्रजाति मारछा कहलाती है। धौली घाट गढ़वाल में निवास करने वाली आदिम प्रजाति तोलछा कहलाती है उत्तरकाशी के  भिलंगना घाटी में निवास करने वाली आदिम प्रजाति जाड लाती है। उनकी भाषा में खानपान रहन सहन, रीति रिवाज पर तिब्बती प्रभाव देखा जा सकता है जबकि जुहारी जनजाति में हिंदू धर्म तथा विशेषकर उत्तराखंड का सबसे ज्यादा प्रभाव देखने के लिए मिलता है।

भोटिया प्रजाति उत्तराखंड की कितनी प्रजाति है उन्होंने युद्ध के वजह पशुपालन एवं व्यापार को अपना व्यवसाय चुनाव तथा पर्वत को अपना निवास बनाया।

भोटिया प्रजाति उच्च पर्वतीय क्षेत्रों तथा निकली घाटी दोनों में ही निवास करती है ये क्षेत्र कृषि की वजह चारागाह हेतु अधिक उपयुक्त होने के कारण भोटिया प्रजाति इन को अधिक महत्व दिया।

भोटिया प्रजाति को घुमक्कड़ प्रजाति भी कहा जाता है क्योंकि यह एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं यह अपनी पशु को चलाते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान को ब्राह्मण करते रहते हैं। ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ यह अपने स्थान भी छोड़कर दूसरे स्थान पर 100 परिवार चले जाते हैं। भोटिया प्रजाति शीतकालीन यात्राएं  सामूहिक रूप से करते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में कूंच कहा जाता है।

सन 1962 में भोटिया प्रजाति का मुख्य व्यवसाय व्यापार हुआ करता था लेकिन भारत और चीन के युद्ध के कारण 1962 के बाद भोटिया प्रजाति प्रमुख वेबसाइट पशुपालन बन गया। भेड़ बकरियां, गाय तिब्बती कुत्ते, घोड़े बकरी पालते है। भेड़ और बकरियों को यह मुख्य रूप से ऊं न के लिए पालते हैं इसके अलावा यहां दुधारू पशु को भी पालते हैं।


भोटिया प्रजाति का सामाजिक जीवन सरल एवं साधारण हैं इनमें धार्मिक एवं सामाजिक कट्टरता कम देखने के लिए । है। भोटिया स्वयं को हिंदू मानते हैं जबकि हिंदू वर्ण व्यवस्था में इन्हें शामिल नहीं किया जाता है इस पर भी वे अपने को सत्री मानते हैं। भोटिया प्रजाति जातियों में विभक्त है।


भोटिया प्रजाति व्यापार व्यवस्था

भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां की 70% जनता प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से लड़की से जुड़ी है इस प्रकार भारत के प्रत्येक भाग की जनता किसी को अपना प्रदान करने के रूप में अपनाए हुए हैं लेकिन भोटिया प्रजाति ऐसे भूत चित्रों में स्थित है जहां सूची कर्म असंभव नहीं तो  कठिन आवश्यक है इसलिए भोटिया प्रजाति के अलावा अन्य कर्मियों को ज्यादा महत्व देती है। इनके द्वारा पशुपालन भी व्यापार का ही एक अंग था। गुंजी व तकलाकोट व्यापारिक केंद्र हुआ करते थे।