कत्यूरी राजवंश का इतिहास


उत्तराखंड के इतिहास में कत्यूरी वंश का महत्वपूर्ण स्थान है ऑडियो वंश उत्तराखंड का सबसे प्राचीन वंश माना जा सकता है इस वंश के काल में उत्तराखंड की संस्कृति का सबसे अधिक विकास हुआ है। कत्यूरी वंश के इतिहास की जानकारी स्मारकों से प्राप्त होती है इस काल में बहुत सारे अभिलेख प्राप्त हुए हैं इसके अलावा उत्तराखंड में प्रचलित धार्मिक नृत्य व कथा जाकर भी कत्यूरी काल के संबंध में बहुत सारी जानकारी देती हैं।

अब तक  कत्यूरी काल के 5 अभिलेख प्राप्त हुए हैं एक शिलालेख की खोज की जा चुकी है। यह अभिलेख पांडुकेश्वर, बागेश्वर, बालेश्वर से प्राप्त हुए हैं इसमें कुछ  अभिलेख राजा भूदेव के द्वारा उत्कीर्ण कराए गए हैं। पांडुकेश्वर में ललितपुर, पदम शिबू त्रास के ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। इन अभिलेखों से कत्यूरी शासकों की वंशावली के साथ-साथ उनकी अवस्था के बारे में जानकारी मिलती है।





कत्यूरी वंश के अनेक स्मारक एवं कलाकृतियां भी उत्तराखंड के अनेक स्थानों में प्राप्त हुई हैं स्मारकों में उत्तराखंड की तत्कालीन सांस्कृतिक और धार्मिक स्थिति का ज्ञान होता है। कत्यूरी कालीन स्मारक एवं कलाकृतियां बागेश्वर जागेश्वर, पांडुकेश्वर जोशीमठ प्रेस नाथ बद्रीनाथ सोमेश्वर तपोवन श्रीनगर लाखामंडल इत्यादि स्थानों से प्राप्त हुई है।

उपरोक्त सामग्री के अतिरिक्त कचोरी काल के संबंध में विशेष  कत्यू कत्यूरी एवं घटनाक्रम के संबंध में विशेषकर   कत्यूरी वंशावली एवं अन्य घटनाक्रम के संबंध में उत्तराखंड में प्रचलित लोक कथाएं एवं जागरण इत्यादि से भी जानकारी प्राप्त होती है।


कत्यूरी वंश के इतिहास के संबंध में चर्चा करने से पहले   कत्यूरी की उत्पत्ति के संबंध में जानकारी लेना आवश्यक है। कत्यूरी वंश के संबंध में विद्वानों में काफी मतभेद है। उत्तराखंड के कुछ विद्वानों का मानना है कि  अल्मोड़ा के शालीवाहन वहां नामक एक सूर्यवंशी कुमार अयोध्या से आकर कत्यूर नामक स्थान  में निवास करने लगा। उसी के वंशज आगे चलकर कत्यूर में निवास के कारण कत्यूरी कहलाए यहां मत प्रमाणिकता के अभाव  माना जाता है। एटकिंसन ने कत्यूरी वंश को काबुल और पश्चिम अरे की ढलान में निवास कर रही कठोर नामक  आयुधजीवी जाति का वंशज माना है।


परंतु कटार और कत्यूरी एक ही थे इस से प्रमाणित करने के लिए ऐतिहासिक सामग्री का अभाव है। प्रसिद्ध इतिहासकार ने कत्यूरी वंश को शक और कुषाण वंश से संबंधित माना है। उनके अनुसार हुनों से पराजित होने के पश्चात शक और कुषाण ने कत्यूरी वंश की न्यू डाली होगी। इतिहासकार राहुल शासक शालीवाहन और कचोरी वंश के संस्थापक शालीवाहन को ही एक मानते हैं। अपने कथन से उन्होंने प्रमाणित करने हेतु  मंदिर कटारमल और बागेश्वर और द्वारा हटा दी के मंदिर में पाई गई बूट धारी मूर्तियां का उदाहरण प्रस्तुत किया है और भी बूट धारी मूर्तियों को शको की दीन देन्न मानते हैं। उत्तराखंड के इतिहासकार के शिव प्रसाद डबराल का मानना है कि कत्यूरी खस थे। अपने मत को प्रमाणित करने हेतु उन्होंने बंगाल के पाल शासकों के अभिलेख का सहारा लिया है। पाल कत्यूरी के समकालीन थे। पाल अभिलेखों के अनुसार खस देश पाल शासक के अधीन था। खस उत्तराखंड की सबसे शक्तिशाली प्रसिद्ध जाती थी उन्होंने कोल एवं किरात को पराजित कर उत्तराखंड में अपनी सत्ता स्थापित की थी। खास की सामाजिक स्थिति में काफी समानता थी उत्तराखंड के राजपूत राजा एवं कत्यूरी वंश के वंशजों को दोनों को निम्न माना है।


कत्यूरी वंश की प्रारंभिक राजधानी कार्तिकेयपुर थी। कार्तिकेयपुर पूर्व जोशीमठ के पास स्थित था। इसी कार्तिकेय पुर शब्द से कत्यूरी वंश शब्द का उद्भव हुआ।